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भारत के महान खोजकर्ता Vasco da Gama के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी

आज हम आप को अपनी इस पोस्ट के माध्यम से भारत के खोजकर्ता Vasco da Gama के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी देने जा रहे हैं तो हमारी इस पोस्ट को ध्यान से पढ़ें। भारत में पहली यूरोपी यात्री का पूरा नाम डॉम वास्को डी गामा था।

जिनका जन्म करीब 1460 से 1469 के बीच में अलेजेंटो के साईनेस में हुआ था, इनकी माता का नाम इसाबेल सोर्ड़े तथा पिता का नाम एस्तेवाओ द गामा था, इनकी पत्नी का नाम कैटरीना द अतायदे था।

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Vasco da Gama का जन्म

भारत के महान खोजकर्ता Vasco da Gama के शुरुआती जीवन और जन्म के बारे में इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं, इस को लेकर सभी के अलग अलग तथ्य हैं।

हालांकि कुछ इतिहासकार उनका जन्म 1460 में मानते हैं और कुछ वैज्ञानिक और प्रसिद्ध ऐतिहासकर उनका जन्म 1469 में पुर्तगाल के अलेंटेजो प्रांत के समुद्री तट पर स्थित साइनेस के किले में बताते हैं।

वास्को डी गामा के पिता एस्तेवाओ द गामा

इसी के साथ Vasco da Gama के पिता एस्तेवाओ द गामा भी एक महान खोजी नाविक थे, इसी के साथ उनके पिता को “नाइट” की उपाधि भी मिली थी, बाद में Vasco da Gama ने अपने पिता के व्यापार में रुचि ली और वे भी समुद्री यात्रा लिए जाया करते थे तथा पिता के जहाजों की कमान संभालने लगे।

वास्को डी गामा की पहली भारत की समुद्री जहाज यात्रा

पहली बार यूरोपी यात्री भारत में व्यापारिक मार्गों की खोज के लिए 8 जुलाई1497 को Vasco da Gama अपने 4 जहाजों के एक बड़े बेड़े के साथ केप टाउन होते हुए साउथ अफ्रीका के लिस्बन पहुंचे थे, इस दौरान उनके पास दो मीडियम साइज के 03 मस्तूलों वाले जहाज थे, हर जहाज का वजन लगभग 120 टन हुआ करता था।उनका नाम सॉओ रैफल और सॉओ ग्रैब्रिअल था।

करीब 10 हजार किलोमीटर का लंबा सफर

इसी के साथ करीब 10 हजार किलोमीटर का लंबा सफर तय करने में उन्हें लगभग 3 महीने का लंबा वक्त लगा था वो तीन महीने तक समुन्द्र में ही रहते थे तथा अपने साथ अपना सारा खाने पीने का सामान ले जाया करते थे। 4 जहाज के अलावा उनके बेडे़ के साथ इस यात्रा के दौरान 03 दुभाषिए भी थे।

आपको बता दें कि यह बेड़े अपनी खोज और जीते गए जमीनों को चिन्हित करने के लिए अपने साथ पेड्राओ यानि कि पाषाण स्तंभ भी ले गए थे। भारत के खोजकर्ता Vasco da Gama ने बहुत सी समुंद्री यात्राएं की थी।

15 जुलाई को वे केनेरी द्धीप पहुंचे और 26 जुलाई को उनका बेड़ा केप वर्डे द्धीप के सॉओ टियागो पर पहुंचा

Vasco da Gama अपनी पहली समुद्री यात्रा की खोज के दौरान 15 जुलाई को वे केनेरी द्धीप पहुंचे और 26 जुलाई को उनका बेड़ा केप वर्डे द्धीप के सॉओ टियागो पर पहुंचा था।

इसी के साथ यहां करीब 8 दिन रुकने के बाद Vasco da Gama ने गुयाना की खाड़ी की बहुत तेज जलधाराओं से अपने जहाज़ को बचाने के लिए लिए केप ऑप गुड होप के दक्षिणी अटलांटिक से होते हुए एक घुमावदार रास्ता अपनाया तथा अपनी यात्रा आगे के लिए जारी रखी इसी दौरान यह अपने विशाल बेड़े के साथ 7 नवंबर को सांता है लेना खाड़ी जो कि वर्तमान में दक्षिण अफ्रीका में आता है, वहां पर पहुंच गए और कुछ समय रुकने के बाद वो आगे निकल गए।

तूफान के चलते उनकी केफ ऑफ गुड होप से मुडने की यात्रा को नवंबर तक रोक दिया गया

इसी के साथ 16 नवंबर को वे अपनी पूरी टीम के लिए वहां से निकले मगर ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार बताया जा जाता है कि मौसम में खराबी और तूफान के चलते उनकी केफ ऑफ गुड होप से मुडने का यात्रा को नवंबर तक रोक दिया गया, इसी के साथ Vasco da Gama ने मोस्सेल की खाड़ी की तरफ अपना रुख किया तथा यहां उन्होंने एक द्धीप पर सामान रखने वाले जहाज एवं पेड्राओ गाड़ा को अलग-अलग होने के लिए कहा तथा वो इसके बाद यहां से 25 दिसंबर को नटाल के तट पर पहुंच गए।

11 जनवरी, 1498 को नटाल के तट पर पहुंच गए

उन्होंने इस अभियान को आगे बढ़ाते हुए वे 11 जनवरी, 1498 को नटाल के तट पर पहुंच गए तथा इसके बाद वास्को डी गामा अपने इस बेड़े के साथ नटाल और मोजांबिक के बीच एक छोटी सी नदी के पास पहुंचें , जिसे उन्होंने ”रियो द कोबर नाम दिया” गया है।

2 मार्च को बेड़ा मोजांबिक द्धीप पहुंच गया

इसके बाद फिर अपने इस अभियान को आगे बढ़ाते हुए वे आधुनिक मोजांबिक में क्लीमेन नदी पर पहुंचे, जिसे उन्होंने ”रियो डोस बोन्स सिनाइस” नाम दिया इसी के साथ उन्होंने वहीं इस अभियान के दौरान जहाज दल के कई मेंबर विटामिन C की कमी से होने वाले रोग स्कर्वी रोग से पीड़ित हो गए तथा जिसके चलते करीब 1 महीने तक यह अभियान को उन्होंने रोक दिया तथा फिर इसके बाद 2 मार्च को बेड़ा मोजांबिक द्धीप पहुंच गया।

द्धीप में वास्को डी गामा को अरब के व्यापारियों से भारत व्यापार के बारे में जानकारी हासिल हुई

इसी के साथ जानकारी के अनुसार इस द्धीप में वास्को डी गामा को अरब के व्यापारियों के साथ उनके व्यापार के बारे में जानकारी हासिल हुई है, इसी के साथ वहां पर सोने, चांदी और मसालों से भरे 04 बड़े अरबी जहाज भी खड़े हुए थे। जिनको देख कर वो बहुत ही प्रसन्न हुए तथा इसके अलावा उन्हें मोजांबिक के शासक प्रेस्टर जॉन के कई तटीय शहरों पर कब्जा होने का भी पता चला जिसके बाद उन्होंने भारत की और रुक किया।

प्रेस्टर जॉन ने वास्को डी गामा को 02 पोत चालक उपलब्ध करवाए

प्रेस्टर जॉन ने वास्को डी गामा को 02 पोत चालक उपलब्ध करवाए, जिसमें एक उस दौरान भाग गया जब उसे पुर्तगालियों के ईसाई होने के बारे में पता चला इसी के साथ यह अभियान दल 14 अप्रैल को मालिंदी में पहुंच गया।

यहां बास्को डि गामा ने भारत के दक्षिण-पश्चिम किनारे पर स्थित कालीकट का रास्ता जानने वाले एक चालक को अपने साथ ले लिया तथा जिसकी मदद से वो कालीकट तट पर पकड़ा गया।

बेड़ा 20 मई 1498 को भारत के दक्षिण-पश्चिम के तट पर स्थित कालीकट पहुंचा

इसी के साथ हिन्द महासागर में कई दिनों की यात्रा के बाद उनका बेड़ा 20 मई 1498 को भारत के दक्षिण-पश्चिम के तट पर स्थित कालीकट पहुंचा, जहां पर वास्को डी गामा ने अपने भारत पहुंचने के प्रमाण के रुप में स्थापित किया साथ ही कालीकट में भारत के सबसे अधिक प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण लोकप्रिय व्यापारिक केन्द्रों में से एक माना जाता था। इसी के साथ इस दौरान वास्को डी गामा ने कालीकट के शासक से कारोबार के लिए हामी भरवा ली तथा यहां उस का स्वागत किया गया।

करीब 3 महीने तक बास्को डि गामा कालीकट रहा

करीब 3 महीने तक यहां रहने के बाद कालीकट के शासक के साथ कुछ मतभेदों के चलते वास्को डी गामा को अगस्त में कालीकट को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा तथा उसे यहां से निकलना पड़ा, वहीं इस दौरान वास्को डी गामा द्वारा भारत की खोज की खबर फैलने लगी तथा यह पता लगने लगा की भारत एक प्रसिद्ध और सोने की चिड़िया है यहां बहुत माल है असल में वास्को डी गामा ने यूरोप के व्यापारियों, सुल्तानों और लुटेरों के लिए एक समुद्री रास्ते की खोज की जिसके लिए उन्हें पैसे दिए जाते थे।

वास्को डी गामा मालिंदी के लिए निकले, इस यात्रा के दौरान 8 जनवरी, 1499 को वे अजिंदीव द्धीप पहुंचा

भारत पर कब्जा जमाने की मंशा से यूरोप के कई राजा और व्यापारी आए और अपना अधिकार जमाने की कोशिश की इसी के साथ यही नहीं बल्कि पुर्तगालियों की वजह से ही ब्रिटिश लोग भी भारत आने लगे जैसे ही उन्हें सुचना मिलने लगी वो भी भारत की ओर आकर्षित होने लगे। इसी के साथ वास्को डी गामा मालिंदी के लिए निकले, इस यात्रा के दौरान 8 जनवरी, 1499 को वे अजिंदीव द्धीप पहुंच गए।

अरब सागर को क्रॉस करने में उन्हें लगभग 3 महीने का लंबा वक्त लग गया

इसी दौरान प्रतिकूल हवाओं और समुद्री तूफान के कारण अरब सागर को क्रॉस करने में उन्हें लगभग 3 महीने का लंबा वक्त लग गया तथा उन्हें वहीँ रुकना पड़ा, इसी के दौरान उनके अभियान दल के कई सदस्य गंभीर बीमारी की वजह से मृत्यु हो गई जिस बजह से यात्रा और लम्बी हो गयी।

सॉओ रैफल जहाज को जला देने के आदेश दे दिए गए

इसी के साथ मालिंदी पहुंचने पर इस तरह उनकी अभियान दल की संख्या बेहद कम रह गई थी, साथ ही जिसकी वजह से सॉओ रैफल जहाज को जला देने के आदेश दे दिए गए थे, इस तरह वास्को डी गामा ने वहां पर भी अपने एक पेड्राओ को गाड़ा को 1 फरवरी को मोजांबिक पहुंचे जहां पर उन्होंने अपना आखिरी पेड्राओ स्थापित कर दिया।

10 जुलाई को पुर्तगाल की ट्रैगॉस नदी पर पहुंचा

इसी के साथ इसके बाद समुद्री तूफान की वजह से सॉओ ग्रैब्रिएल और बेरिओ दोनों अलग-अलग हो गए साथ ही बेरिओ करीब 10 जुलाई को पुर्तगाल की ट्रैगॉस नदी पर पहुंचा जबिक सॉओ ग्रेबिएल ने एजोर्स के दर्सीरा द्धीप के लिए अपनी यात्रा जारी रखी और 9 सितंबर को लिस्बन पहुंच गया।

वास्को डी गामा की भारत की दूसरी समुद्री यात्रा

इसी के साथ 1498 के बाद 1502 में वास्को डी गामा ने एडमिरल के रुप में करीब 10 जहाजों का नेतृत्व का दिया उस समय यह एक बहुत बड़ी संख्या हुआ करती थी। जिसमें ने हर जहाज की मद्द के लिए करीब 9 बेड़े थे।

इसी के साथ अपनी दूसरी समुद्री यात्रा को आगे बढ़ाते हुए 14 जून, 1502 को वास्को डी गामा का यह बेड़ा पूर्वी अफ्रीका के सोफला पोर्ट पर पहुंच गया साथ ही फिर इसके बाद वे दक्षिणी अरब तट का चक्कर लगाने लाए गोवा पहुंच गए।

अरबी जहाजों को लूटने के इंतजार में रुके हुए थे

साथ ही दक्षिण-पश्चिम भारत के कालीकट के उत्तर में स्थित कन्त्रागोर पोर्ट में वे अरबी जहाजों को लूटने के इंतजार में रुके हुए थे, इस दौरान उन्होंने माल से लदे अरबी जहाज का माल जब्त करने के बाद उसमें आग लगा दी तथा बहुत सारा माल लूट लिया जिसमे सोना चांदी मसाले और अन्य बहुत सी कीमती बस्तुएं थी।

जानकारी के अनुसार इस अरबी जहाज पर माल के साथ-साथ महिलाएं, बच्चे समेत तमाम यात्री मौजूद थे, जो कि इस जहाज के साथ जलकर मर गए थे।

कालीकट के हिन्दू शासक जमोरी के दुश्मन कन्त्रानोर के शासक के साथ एक संधि

यह वास्को डी गामा के व्यवसायिक जीवन का सबसे भयावह और दिल दहलाने वाली घटना थी। इसी के साथ कालीकट के हिन्दू शासक जमोरी के दुश्मन कन्त्रानोर के शासक के साथ एक संधि के बाद वास्को डी गामा का अभियान कालीकट के लिए रवाना हो गया है तथा कालीकट पहुंच गया।

वास्को डी गामा ने दोस्ती के हाथ आगे बढ़ाए

इसी दौरान जमोरीं ने वास्को डी गामा ने दोस्ती के हाथ आगे बढ़ाए, लेकिन वास्को डी गामा ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया क्योँकि पहले उसे यहां से निकालने के लिए विवश किया था। इसी के साथ वास्को डी गामा ने पहली पोर्ट से सभी मुस्लिमों को निकालने की धमकी दी और फिर पोर्ट पर जमकर बमबारी भी कर दी। यही नहीं वास्को डी गामा ने जहाज पर अपना सामान बेचने आए करीब 38 हिन्दू मछुआरों की भी जान ले ली।

समुद्री मार्गों की खोज ने दुनिया में व्यापार के लिए कई नए अवसर खोले

प्राप्त जानकारी के अनुसार इस तरह वास्को डी गामा की भारत में समुद्री मार्गों की खोज ने दुनिया में व्यापार के लिए कई नए अवसर खोले जिस बजह से यूरोप में भी व्यवसाय भारत से हो पाया आज उनकी खोज की वजह से ही सामुद्रिक मार्गों से व्यापार इतना आसान हुआ है। वास्को डी गामा की भारत खोज के लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है।