cat fish

गंगा नदी में पाई गई अमेरिका की अमेजन नदी की सबसे घातक सकरमाउथ कैट फिश

भारत के सबसे पवित्र और सबसे लम्बी नदी गंगा जिस की लम्बाई 2525 किलोमीटर की है, प्राप्त जानकारी के अनुसार यहां अमेरिका की अमेजन नदी में पाई जाने वाली सबसे

लोकप्रिय और प्रसिद्ध कैटफिश की एक और प्रजाति काशी की गंगा में पाई गयी है। इसी के साथ इस मछली का नाम सकरमाउथ कैट फिश है।

गंगा में मिलने से बीएचयू के जंतु विज्ञानी बेहद चिंता में

इस मछली के गंगा में मिलने से बीएचयू के जंतु विज्ञानी बेहद चिंता में पड़ गए हैं। एक महीने के भीतर यह दूसरा मौका है जब गंगा नदी में कैट फिश पाई गई है इस मछली ने सभी विज्ञानिको को चिंता में डाल दिया है।

24 सितंबर को काशी के दक्षिण में रमना गांव के पास गंगा में पाई गयी

अमेरिका में पाई जाने वाली यह सकरमाउथ कैट फिश के मिलने से वैज्ञानिकों की चिंता कई गुना और बढ़ गई है बताया जा रहा है की यह मछली गंगा की पारिस्थितिकी के लिए बेहद खतरनाक मानी जा रही है,

साथ ही यह भी बताया जा रहा है की यह 24 सितंबर को काशी के दक्षिण में रमना गांव के पास गंगा में पाई गयी है। यह मछली मछुआरों के महाजाल में फंसी मिली है।

देहरादून के वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट

इस अजीबो गरीब मछली को देख कर मछुआरों ने इसकी सूचना गंगा प्रहरी दर्शन निशाद को दी जिस के बाद देहरादून के वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट में प्रशिक्षित दर्शन निशाद इसे

देखते ही पहचान गए की यह मछली कोई साधारण मछली नहीं है। यह विशेष कर अमेरिका की अमेजन नदी में पाई जाती है।

मछली को जीवित अवस्था में बीएचयू के जंतु विज्ञानियों तक पहुंचाया

इस बार जीवित अवस्था में बीएचयू के जंतु विज्ञानियों तक पहुंचाया है। साथ ही इस मछली की फोटो और वीडियो देहरादून के वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट के मछली विशेषज्ञ डॉ. रुचि

बडोला को भी भेज दी गयी है। इससे पूर्व इसी महीने की 03 तारीख को गोल्डेन कलर की सकर कैटफिश गंगा में सूजाबाद के पास मिली थी।

साथ ही बताया जा रहा है की बीएचयू के जंतु विज्ञानियों ने इस मछली के कारण होने वाले पारिस्थितिकीय परिवर्तनों के बारे में पता लगाने का काम शुरू कर दिया गया है जिस पर अध्यन जारी है।

जंतु वैज्ञानिक नाम हाइपोस्टोमस प्लोकोस्टोमस

प्राप्त जानकारी के अनुसार बताया जा रहा है की बीएचयू के जंतु विज्ञानी प्रो. बेचन लाल ने बताया कि यह जलीय पारिस्थितिकी में भयानक असंतुलन का कारण है.

इसी के साथ यह अपने से छोटी मछलियों ही नहीं बल्कि अन्य जलीय जीवों को भी खा जाती हैं। इस मछली का जंतु वैज्ञानिक नाम हाइपोस्टोमस प्लोकोस्टोमस है।

विदेशों में इसे प्लैको नाम से भी जाना जाता

बताया जा रहा है की विदेशों में इसे प्लैको नाम से भी जाना जाता है। यह देसी मछलियों को प्रजनन के लिए विशेष परिस्थिति की जरूरत होती है। लेकिन इनके साथ ऐसा नहीं है। ये मछलियां जल में किसी भी परिस्थिति में और कहीं भी प्रजनन कर सकती हैं।

मछली देश की लगभग सभी नदियों में पाई जाने लगी, जो एक चिंता का विषय

प्रो. लाल ने जानकारी देते हुए बताया कि चिंता की बात तो यह है कि यह मछली देश की लगभग सभी नदियों में पाई जाने लगी है। इसी के साथ उन्होंने यह भी बताया की यह मांसाहारी प्रवृत्ति की ये मछलियां आकार में भले ही दो इंच से सवा फिट तक की होती हैं।

लेकिन इनमें न तो खाद्य गुणवत्ता है और न ही इनमें किसी प्रकार का औषधीय गुण पाया जाता हैं।

यह मछलियां मछुआरों की आजीविका के लिए भी संकट

दोनों ही दृष्टि से बेकार होने के कारण यह मछलियां मछुआरों की आजीविका के लिए भी संकट उत्पन्न कर रही हैं इस मछली से मछुवारो को भी बेहद नुक्सान पहुंच सकता है।

उन्होंने बताया कि इन मछलियों को नदियों से समाप्त करना अब असंभव सा हो गया है हर दिन इन की संख्या में बढ़ोतरी ही हो रही है।

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