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Space में कैसा होता है जीवन, क्या प्रॉब्लम होती है Space में

आज दुनिया कहा से कहा पहुंच गए है, आज से कुछ साल पहले किसी को पता भी नहीं था की हम एक दिन अंतरिक्ष में जाएंगे मगर आज टेक्नॉजी और विज्ञान की मदद से अंतरिक्ष की सैर का सपना हर कोई व्यक्ति अपनी कड़ी मेहन्नत करनी पड़ेगी,

मगर अधिकार लोगो को यह ही नहीं पता होता की उस के लिए किया क्या जाए तथा अंतरिक्ष यात्री कैसे बनाया जाए तथा उस के लिए क्या क्या कर सकते है मगर अंतरिक्ष यात्री बनना आसान नहीं है।

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अंतरिक्ष यात्री बनने के लिए क्या करना होगा

इसी के साथ आज हम आप को अपनी इस पोस्ट के द्वारा यह जानकारी देंगे की आप कैसे यहां तक पहुंच सकते है, एक तो आप में तुरंत फ़ैसला करने की क़ाबिलियत होनी चाहिए साथ ही आपकी सेहत आम लोगों के मुक़ाबले

ज़्यादा बेहतर होनी चाहिए और दबाव होने के बावजूद आपका ज़हनी सुकून डगमगाना नहीं चाहिए। एक अंतरिक्ष यात्री बनने के लिए ये चंद बुनियादी बातें हैं जिन्हें ‘द राइट स्टफ़’ कहा जाता है।

1950 में नासा ने भी अपना पहला अंतरिक्ष यात्री एयरफ़ोर्स के पायलट को ही चुना था

प्राप्त जानकारी के अनुसार आम तौर से अंतरिक्ष यात्री एयरफ़ोर्स के बेहतरीन पायलट होते हैं इसी के साथ 1950 में नासा ने भी अपना पहला अंतरिक्ष यात्री एयरफ़ोर्स के पायलट को ही चुना था साथ ही यही काम सोवियत संघ ने भी किया था।

इसी के साथ फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि सोवियत संघ ने इस क्षेत्र में महिलाओं को भी शामिल कर लिया था, और साथ ही लंबाई की बंदिश लगा दी यानी किसी भी

अंतरिक्ष यात्री की लंबाई पांच फ़ीट छह इंच से ज़्यादा नहीं हो सकती थी जिस का कारण अंतरिक्ष यान था।

2009 में यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने अपने यहां 06 अंतरिक्ष यात्री भर्ती किए थे

इसी के साथ क़रीब 60 साल से रिसर्च के लिए इंसान अंतरिक्ष में जा रहे हैं, मगर अगर देखा जाए तो अभी भी अंतरिक्ष में जाने के लिए शर्तें आज भी वही हैं, जो पहले थी इसी के साथ मिसाल के लिए 2009 में यूरोपियन

स्पेस एजेंसी ने अपने यहां 06 अंतरिक्ष यात्री भर्ती किए थे इनमें से 03 फ़ौज के पायलट हैं और एक पेशेवर पायलट है, एक स्काई डाइवर है. जबकि उन में से एक पर्वतारोही है।

अंतरिक्ष में रह पाना कितना मुश्किल

शायद आप इस बात का अन्ताजा भी नहीं लगा सकते की अंतरिक्ष में रह पाना कितना मुश्किल होता है, इसी लिए कोशिश हमेशा यही रहती है कि बेहतरीन लोगों को ही अंतरिक्ष में भेजा जाए मगर आम इंसान का अंतरिक्ष

में रह पाना आसान नहीं होता है मुनष्य ज़मीन पर ऑक्सीजन के ग़िलाफ़ में रहते हैं. इसी लिए वो जीवित है। इसके बिना इंसानी वजूद की कल्पना नहीं की जा सकती।

ब्रह्मांड में क्या क्या होता है आप के पास

मगर सोचो की धरती से इतनी दूर अंतरिक्ष में रहने वाले बनावटी सांसों के सहारे जीते हैं. साथ ही उन्हें ब्रह्मांड में मौजूद रेडिएशन झेलना पड़ता है तथा विभिन्न

परिस्थितियो का सामना करना पड़ता है। इसका सीधा असर उनकी सेहत पर भी पड़ता है।

सोचने समझने की क्षमता भी खत्म हो जाती

शरीर कमज़ोर पड़ने लगता है तथा हर समय बेचैनी महसूस होती रहती है, साथ ही आंखें कमज़ोर हो जाती हैं तथा कमज़ोरी इतनी बढ़ जाती है कि बीमारियों से लड़ने की क़ुव्वत नहीं रहती तथा व्यक्ति की सोचने समझने की क्षमता भी खत्म हो जाती है।

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में क़रीब साढ़े पांच महीने रहे

इसी के साथ अंतरिक्ष यात्री ल्यूका परमितानो इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में क़रीब साढ़े पांच महीने रहे. वो कहते हैं कि जैसे-जैसे दिन गुज़रते जाते है वैसे वैसे आपकी

टांगें ख़ुद आपको ही कमज़ोर और पतली महसूस होने लगती हैं। साथ ही चेहरा गोल होने लगता है।

बनावटी वातावरण और एक प्राकृतिक वातावरणम में कितना फर्क होता

बनावटी वातावरण और एक प्राकृतिक वातावरणम में कितना फर्क होता है यह आप किसी अंतरिक्ष यात्री से ही पूछ सकते है।

वापस धरती पर आने के बाद भी नॉर्मल होने में काफ़ी समय लग जाता है क्युकी अंतरिक्ष का वातावरण बहुत ही अलग होता है।

06 महीने बाद आप धीरे-धीरे दूसरी दिशाओं में घूमना भी शुरू कर देते

इसी के साथ अंतरिक्ष में शुरुआत के दिनों में एक ही दिशा में चलना पड़ता है. साथ ही 06 महीने बाद आप धीरे-धीरे दूसरी दिशाओं में घूमना भी शुरू कर देते हैं इसी के साथ स्पेस स्टेशन की जगह को पहचानना शुरू करते हैं।

अंतरिक्ष में ज़ीरो गुरुत्वाकर्षण की वजह से अंतरिक्ष यात्री हवा में ही झूलते रहते हैं। लिहाज़ा आपकी टांगों का कोई काम नहीं रहता. अंतरिक्ष में बहुत लंबे समय तक टिक पाना आसान नहीं होता है।

अंतरिक्ष यात्री वैलेरी पोलियाकोव 437 दिन तक अंतरिक्ष में रहे

इसी के साथ अंतरिक्ष यात्री वैलेरी पोलियाकोव ने अब तक अंतरिक्ष में सबसे लंबा समय गुज़ारा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार वो 437 दिन तक अंतरिक्ष में रहे है,

इसी के साथ विचार किया जा रहा है कि अंतरिक्ष में ही ऐसी व्यवस्था की जाएं जहां रिसर्चर फिट रह सकें इसी के साथ इसके लिए सबसे अहम है,

उन्हें रेडिएशन से कैसे बचा जाए साथ ही उनके लिए लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम की व्यवस्था होना भी बेहद ज़रूरी है, इसी के साथ इस सिलसिले में कई वर्कशॉप भी की जा चुकी हैं।

अमरीकी न्यूरो साइंटिस्ट रॉबर्ट हेम्पसन

साथ ही अंतरिक्ष में बस्तियां बसाने पर चर्चा हुई है, इसी के साथ इस वर्कशॉप में इंजीनियर, वैज्ञानिक और बड़े रिसर्चर शामिल हुए थे, इसी के साथ अमरीकी न्यूरो

साइंटिस्ट रॉबर्ट हेम्पसन मानते हैं कि अंतरिक्ष में बस्तियां बसाना आसान काम नहीं था इसी लिए इस काम को करने में लंबा समय लगता है।

साथ ही तब तक अंतरिक्ष में जाने वालों को ही इस लायक़ बनाने की ज़रूरत है,, कि वो वहां के माहौल के मुताबिक़ ख़ुद को ढाल सकें और सेहतमंद रह सकें।